- आतंकी संगठन शहजाद भट्टी नेटवर्क The post आतंकी संगठन शहजाद भट्टी नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क के बारे में जानिए और उसके प्रमुख कारनामों के विषय में समझिए appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- बारह बजे के वादे से शाम की सड़क The post बारह बजे के वादे से शाम की सड़क तक appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- डॉ. दवे की विशेषता यह रही कि उन्होंने साहित्य को केवल पुस्तकों की दुनिया तक सीमित नहीं माना। साहित्य उनके लिए समाज की संवेदना, संस्कृति की स्मृति और मनुष्य के जीवनानुभव से जुड़ा विषय है। The post साहित्य की सेवा को समर्पित एक सक्रिय व्यक्तित्व : डॉ. विकास दवे appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- पारंपरिक चिकित्सा पर शोध The post पारंपरिक चिकित्सा पर शोध बढ़ाएगा डब्ल्यूएचओ, आयुर्वेद को मिलेगी संजीवनी appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर The post कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- भारत की पहचान उसकी भाषायी विविधता में है। यहां भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनानुभव, संस्कृति और संवेदना की वाहक है। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल तक बदलती बोलियां The post हिन्दी संवाद की भाषा, विवाद की नहीं appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- पिघलते ग्लेशियर और खोखले होते पहाड़ The post पिघलते ग्लेशियर और खोखले होते पहाड़ः चेतावनी सुने appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- रामधारी सिंह दिनकर The post रामधारी सिंह दिनकर : महान कवि और सांस्कृतिक एकता के पैरोकार appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि ऋण की किस्तें न चुकाने पर वित्तीय संस्था वाहन जब्त नहीं कर सकती। यदि ऋणग्राही अपने दायित्वों का पालन नहीं करता है तो ऋणदाता के पास कानून और अनुबंध के अनुसार कार्रवाई करने के अधिकार बने रहते हैं। लेकिन उस कार्रवाई की प्रक्रिया कानूनसम्मत, पारदर्शी और सम्मानजनक होनी चाहिए। The post सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला : वाहन जब्ती में मनमानी, बलप्रयोग और अनुचित समय पर कार्रवाई पर कड़ा संदेश appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- इसीलिए 33.13 लाख लोगों का आंकड़ा अपने आप में न तो यह सिद्ध करता है कि इतने लोग अपात्र हैं और न ही यह कि इतने लोगों के रिकॉर्ड गलत हैं। यह संख्या मुख्यत: उन लोगों की है जिनके मामलों में आगे सत्यापन की जरूरत महसूस की गई है। The post मतदाता सूची का पुनरीक्षण: सुधार जरूरी, लेकिन पारदर्शिता उससे भी जरूरी appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- भगवान गणेश The post भगवान गणेश : मंगल, समृद्धि और विकसित भारत के प्रेरणास्रोत appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- लोकभाषाओं में सबसे प्रचलित और विश्व प्रसिद्धअवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'श्रीरामचरितमानस'का नाम लिया जाता है। तमिल भाषा में कम्बन् द्वारा रचित The post भारतीय भाषाओं में रामायण appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- अर्थात, मान्यता है कि पवमान सोम देवता ने दस्युओं यानी अनार्यों से मनु की रक्षा की। दासों और दस्युओं के साथ हुए संघर्ष में सफलता प्राप्त करने पर ही मनु की महिमा लोकव्यापी हुई। वह सोम ही था, जिसके सेवन के प्रभाव से मनु शत्रु अनार्यों के लिए विनाशक सिद्ध हुए थे। महाप्रलय में इकलौते बचे मनु The post वैवस्वत मनु (धारावाहिक उपन्यास अंश) appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- संभव है चिर युवा The post मन की शक्ति द्वारा ही संभव है चिर युवा बने रहना appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- योग करें The post योग करें, रोज करें और मौज करें appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- गंगा के अवतरण की कथा The post गंगा के अवतरण की कथा appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- संत कबीर जयंती The post संशय के दौर में सच का संबल हैं कबीर के विचार appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- प्रकृति और मनुष्य के बीच का सेतु The post योग: प्रकृति और मनुष्य के बीच का सेतु appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- Folk Dances of Bihar The post बिहार के लोक नृत्य appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- हिमालय की देवात्मा और सीमांत का स्पंदन The post हिमालय की देवात्मा और सीमांत का स्पंदन appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- (होली दिलों को जोड़ने और दूरी को मिटाने का सबसे रंगीन मौका) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारत की सांस्कृतिक परंपरा में होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय संबंधों का जीवंत उत्सव है। यह वह अवसर है जब रंगों के बहाने मन के भीतर जमी धूल को झाड़ने, रिश्तों में आई दरारों […] The post रंग जो दिलों तक उतर जाएँ appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथियों के अनुसार मनाए जाने वाले उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के संतुलन को समझाने वाले अध्याय हैं। ऐसा ही एक दिव्य पर्व है – गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है। यह दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, जब सम्पूर्ण व्रज भूमि में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाई देता है। परंतु इस पर्व का रहस्य केवल पूजा या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन के अहंकार, विनम्रता, प्रकृति और भगवान के साथ सामंजस्य का गूढ़ संदेश देता है। अहंकार के गर्व को तोड़ने वाली लीला प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब इंद्र के मन में अपनी देवत्व-शक्ति का अहंकार अत्यधिक बढ़ गया, तो उन्होंने वर्षा के नियंत्रण को अपनी व्यक्तिगत सत्ता समझ लिया। वे भूल गए कि वर्षा भी उसी परम ब्रह्म की व्यवस्था का एक अंश है। उसी समय बालरूप श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को समझाया कि “हम सबका पोषण इंद्र नहीं, प्रकृति करती है – यह गोवर्धन पर्वत, यह गायें, यह वन-भूमि।” इंद्र-यज्ञ को रोककर उन्होंने व्रजवासियों से कहा कि वे इस पर्वत का पूजन करें, क्योंकि यह हमारी अन्नदात्री धरती का प्रतीक है। जब इंद्र को यह बात अहंकारजन्य लगी, तो उन्होंने प्रलयकारी वर्षा से गोकुल को डुबाने का प्रयास किया। परंतु वही बालक श्रीकृष्ण सात दिनों तक अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे, और समस्त व्रज की रक्षा की। यह केवल चमत्कार नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक शिक्षा थी – जिसके भीतर श्रद्धा और करुणा का बल हो, उसके लिए प्रकृति भी सहायक बन जाती है। गोवर्धन की दिव्यता और प्रतीकात्मकता गोवर्धन केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि जीवित चेतना का प्रतीक माना गया है। यह पर्वत धरती, जल, वायु और जीवन के संरक्षण का साक्षात् प्रतीक है। पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को गोवर्धन के रूप में प्रकट कर यह दर्शाया कि ईश्वर प्रकृति में ही बसते हैं। गोवर्धन पूजा का अर्थ केवल पहाड़ की आराधना नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण से ही संभव है। जब हम गोवर्धन की पूजा करते हैं, तो वस्तुतः हम अपने अन्न, जल, पशु, वनस्पति और पर्यावरण का सम्मान करते हैं। अन्नकूट का दार्शनिक अर्थ गोवर्धन पूजा के दिन व्रजवासी तरह-तरह के अन्न और पकवान बनाकर उन्हें पर्वत के प्रतीक रूप में सजाते हैं, इसे अन्नकूट कहा जाता है। यह केवल भोग नहीं, बल्कि “अन्न ही ब्रह्म है” की वेदवाणी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है। इस दिन मनुष्य अपने श्रम और प्रकृति की देन के प्रति आभार प्रकट करता है। अन्नकूट यह सिखाता है कि समृद्धि तब तक अर्थहीन है जब तक उसमें बाँटने की भावना न हो। श्रीकृष्ण ने जब सबके साथ बैठकर अन्न का सेवन किया, तो यह सामाजिक समरसता और समानता का अद्भुत उदाहरण बना। विनम्रता का पाठ इंद्र का अहंकार तब शांत हुआ जब उन्होंने देखा कि जिस ‘बालक’ को वे साधारण मानव समझते थे, वही परमात्मा स्वयं हैं। वे पश्चाताप से भर उठे और श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। इस क्षण में देवता से भी बड़ा दर्शन छिपा है – जिस क्षण अहंकार मिटता है, वहीं सच्चा देवत्व प्रकट होता है। आज जब मानव अपने विज्ञान, सत्ता और संपत्ति के बल पर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा है, तब गोवर्धन लीला यह याद दिलाती है कि अहंकार चाहे देवों में भी क्यों न हो, उसका पतन निश्चित है। गोवर्धन और आधुनिक संदर्भ यदि हम इस पर्व को आधुनिक दृष्टि से देखें, तो यह पर्यावरण चेतना का सबसे प्राचीन संदेश देता है। गोवर्धन पूजा बताती है कि मानव को केवल उपभोग नहीं, बल्कि संरक्षण का भाव रखना चाहिए। आज जब धरती जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अंधाधुंध उपभोग से कराह रही है, तब श्रीकृष्ण की यह लीला हमें पुनः सिखाती है कि — “धरती की पूजा करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।” गोवर्धन पूजा में गायों की सेवा, अन्न का दान, वृक्षों का पूजन और पशुधन की रक्षा, ये सब प्रतीक हैं संतुलित जीवन के। गोप और गोकुल की आत्मा गोवर्धन पूजा केवल धर्म का पालन नहीं, बल्कि प्रेम और समुदाय की अभिव्यक्ति भी है। जिस प्रकार सभी व्रजवासी बच्चे, वृद्ध, नारी, पुरुष एक साथ खड़े होकर संकट का सामना करते हैं, वही समाज की एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। आज जब समाज में विभाजन और स्वार्थ की दीवारें ऊँची हो रही हैं, तब गोवर्धन पर्व यह संदेश देता है कि “एकता और सहयोग से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।” गिरिराज की पावन स्मृति व्रजभूमि में आज भी गोवर्धन पर्वत के परिक्रमा-पथ पर लाखों श्रद्धालु जाते हैं। कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण का चरण पड़ा, वहाँ की मिट्टी भी तिलक बन जाती है। गिरिराज के चरणों में झुकना, वास्तव में स्वयं के अहंकार को मिटाना है। गोवर्धन का प्रत्येक कंकड़ हमें यह सिखाता है कि जो झुकता है, वही ऊँचा उठता है। गोवर्धन का शाश्वत संदेश गोवर्धन पूजा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह हमें सिखाता है – · अहंकार का अंत ही दिव्यता की शुरुआत है। · प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है। · समरसता और सहयोग ही जीवन का आधार हैं। जब-जब मानव अपने सीमित अस्तित्व को ईश्वर से बड़ा समझने लगेगा, तब-तब कोई न कोई श्रीकृष्ण उसे उसकी मर्यादा का स्मरण कराएगा। गोवर्धन पर्व इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर की विनम्रता और प्रेम में निवास करते हैं। और शायद यही कारण है कि यह पर्व दीपोत्सव के अगले दिन आता है, क्योंकि अहंकार के अंधकार के बाद ही भक्ति का प्रकाश फैलता है। उमेश कुमार साहू The post धरती के माथे का तिलक गोवर्धन, जहाँ ईश्वर ने विनम्रता सिखाई appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- प्रमोद भार्गवसमुद्र-मंथन के दौरान जिस स्थल से कल्पवृक्ष और अप्सराएं मिलीं, उसी के निकट से महालक्ष्मी मिलीं। ये लक्ष्मी अनुपम सुंदरी थीं, इसलिए इन्हें भगवती लक्ष्मी कहा गया है। श्रीमद् भागवत में लिखा है कि ‘अनिंद्य सुंदरी लक्ष्मी ने अपने सौंदर्य, औदार्य, यौवन, रंग, रूप और महिमा से सबका चित्त अपनी ओर खींच लिया।‘ देव-असुर सभी ने गुहार लगाई कि लक्ष्मी हमें मिलें। […] The post लक्ष्मी के रूप में समाई प्रकृति appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- धनतेरस- 18 अक्टूबर, 2025-ललित गर्ग-धनतेरस का पर्व पंच दिवसीय दीपोत्सव की पवित्र श्रृंखला का आरंभिक द्वार है। यह केवल सोना-चांदी, वस्त्र या बर्तन खरीदने का शुभ दिन नहीं, बल्कि धन के प्रति हमारी सोच को पुनर्संतुलित करने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में धन को सदैव देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, परंतु यह […] The post धनतेरस धन के भौतिक एवं आध्यात्मिक समन्वय का पर्व appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- दीपोत्सव विशेष : रूप चतुर्दशी 2025 ( दीपावली से एक दिन पहले ) उमेश कुमार साहू दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाला रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का उत्सव भी है। इस दिन को छोटी दिवाली और काली चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ दीपावली धन और समृद्धि का […] The post रूप चतुर्दशी : आंतरिक सुंदरता और सकारात्मक ऊर्जा का महापर्व appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- पितृ पक्ष: जहां श्रद्धा बनती है ऊर्जा और आशीर्वाद बनता है भाग्य– योगेश कुमार गोयलहिन्दू धर्म में पितृ पक्ष (श्राद्ध) को बहुत अहम माना गया है। श्राद्ध का अर्थ होता है ‘श्रद्धापूर्वक’। हमारे संस्कारों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने को ही श्राद्ध कहा जाता है। सरल शब्दों में कहें तो दिवंगत परिजनों को […] The post पितृ ऋण से मुक्ति का पुण्यकाल है पितृ पक्ष appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- राजेश जैन रक्षाबंधन हर साल आता है पर हर साल कुछ नया दे जाता है- नई यादें, वादे और भरोसे। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि रिश्तों की असली मिठास महंगे उपहार में नहीं बल्कि उस धागे में होती है जो प्रेम, विश्वास और अपनेपन से बुना होता है। इसलिए भले ही राखी का धागा है बहुत हल्का […] The post एक भाव है राखी, हर भाई-बहन को बांधती है स्नेह की डोर से appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- डॉ शिवानी कटारा सनातन संस्कृति में ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। ‘रक्षा’ का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रक्षा भी है। वहीं ‘बंधन’ किसी को बाधित करने वाला नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मर्यादा से जुड़ा आत्मिक संबंध है। रक्षाबंधन का मूल बहुत प्राचीन है । […] The post रक्षाबंधन और सनातन संस्कृति appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- डा. विनोद बब्बर संस्कृति और पर्व एक दूसरे के उसी तरह से पूरक है जैसे नदी और जल। रक्त और मज्जा। शरीर और आत्मा। संस्कृति जीवन दर्शन, कला, साहित्य, अध्यात्म और संस्कारों जैसे असंख्य रंग-बिरंगे पुष्पों का वह गुलदस्ता है जिसकी सुगंध हजारों वर्षों से निरंतर प्रवाहमान है। पर्व समय-समय पर उस सुगंध की छटा […] The post राष्ट्र रक्षाबंधन अनुष्ठान पर्व appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- सावन का महीना भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में एक विशेष स्थान रखता है। यह वह समय है जब धरती हरी चादर ओढ़ लेती है, आकाश सावन की फुहारों से सज उठता है और हर ओर हरियाली और शीतलता का एक अनुपम संगम दिखाई देता है। इस मौसम में न केवल प्रकृति खिल उठती है, […] The post सावन, शिव और प्रेम: भावनाओं की त्रिवेणी appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- पारंपरिक चिकित्सा पर शोध The post पारंपरिक चिकित्सा पर शोध बढ़ाएगा डब्ल्यूएचओ, आयुर्वेद को मिलेगी संजीवनी appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- भारत की पहचान उसकी भाषायी विविधता में है। यहां भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनानुभव, संस्कृति और संवेदना की वाहक है। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल तक बदलती बोलियां The post हिन्दी संवाद की भाषा, विवाद की नहीं appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- इस प्रकार का असर सबसे पहले छोटे किसान पर पड़ता है। बड़े किसान के पास संसाधन, भंडारण या परिवहन की बेहतर सुविधा हो सकती है, लेकिन सीमांत किसान के पास विकल्प सीमित होते हैं। The post खेती बचानी है तो किसान की ज़रूरतों को समझना होगा appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- क्यूडेंगा The post भारत में डेंगू वैक्सीन की दस्तक: बीमारी के खिलाफ नई उम्मीद appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- दीपक की लौ The post दीपक की लौ और हमारी सांस्कृतिक संवेदना appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस-21 सितम्बर The post युद्ध की राख से शांति का नया संसार कैसे बने? appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- विश्व अल्जाइमर दिवस, The post स्मृति के धुंधलके में योग की रोशनी appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- राजभाषा के रूप में हिंदी The post राजभाषा के रूप में हिंदी की राष्ट्रीय गरिमा और गौरव appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- सितंबर 2026 में पटना उच्च न्यायालय के दो फैसलों ने नालंदा के संदर्भ में प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली के इसी विरोधाभास को सामने रखा है। एक मामले में अस्पताल से नवजात के कथित गायब होने पर प्राथमिकी The post जब व्यवस्था से सवाल पूछती है अदालत appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
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