- अशोक कुमार झाकिसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत उसकी सेना, पुलिस, कानून या सरकारी भवनों में नहीं होती बल्कि उस विश्वास में होती है जो आम नागरिक अपने शासन के प्रति रखता है। जब जनता को यह भरोसा होता है कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, उसकी शिकायतों पर कार्रवाई होगी और उसकी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार संवेदनशील होगी, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब यही विश्वास धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, तब समाज के भीतर असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष कभी आंदोलन बनता है, कभी विद्रोह का रूप लेता है और कभी किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी बन जाता है जिसकी मृत्यु के बाद भी समाज उसके बारे में बहस करता रहता है। आज बिहार में भरत तिवारी का नाम ऐसी ही बहस का केंद्र बना हुआ है। उनकी मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं रह गई है। यह प्रशासनिक संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक जवाबदेही, जनसंघर्ष, सरकारी उपेक्षा और नागरिक अधिकारों पर व्यापक विमर्श का विषय बन चुकी है। भरत तिवारी के समर्थन और विरोध में अनेक मत हो सकते हैं लेकिन एक बात निर्विवाद है कि इस पूरे घटनाक्रम ने व्यवस्था के सामने कुछ ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनसे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। पुराने लोग बताते हैं कि कभी शासन और जनता के बीच संवाद का रिश्ता कहीं अधिक जीवंत हुआ करता था। गांव का कोई सामान्य व्यक्ति यदि किसी अधिकारी या मुख्यमंत्री को पत्र लिख देता था तो उस पर संज्ञान लिया जाता था। जांच होती थी, अधिकारी गांव तक पहुंचते थे और शिकायत का निस्तारण करने का प्रयास किया जाता था। उस समय संसाधन कम थे, तकनीक सीमित थी, संचार व्यवस्था कमजोर थी, फिर भी नागरिक को यह विश्वास था कि उसकी बात सुनी जाएगी। आज स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है। तकनीक ने शासन को आधुनिक बना दिया है। शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल हैं, हेल्पलाइन हैं, मोबाइल एप हैं, जन शिकायत निवारण प्रणाली है, जनप्रतिनिधियों के कार्यालय हैं और सोशल मीडिया जैसा शक्तिशाली माध्यम भी उपलब्ध है लेकिन इसके बावजूद आम नागरिक का भरोसा लगातार कमजोर होता दिखाई देता है। कारण यह नहीं कि शिकायत करने के साधन नहीं हैं बल्कि कारण यह है कि शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया पर लोगों का विश्वास घटता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली सड़कें, पुल, नहरें, तटबंध और अन्य विकास परियोजनाएं अक्सर विवादों में रहती हैं। लोग निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगाते हैं। कई बार शिकायतें भी करते हैं लेकिन जब महीनों और वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तब उनके भीतर यह धारणा बनने लगती है कि व्यवस्था केवल कागजों में चल रही है, जमीन पर नहीं।यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र कमजोर होना शुरू होता है क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि जनता को यह लगने लगे कि उसकी आवाज का कोई मूल्य नहीं है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा होने लगता है। भरत तिवारी की कहानी भी कुछ इसी पृष्ठभूमि में देखी जा रही है। उनके समर्थकों का कहना है कि वे बाढ़ प्रभावित लोगों, विस्थापित परिवारों और स्थानीय जनसमस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे थे। उनका आरोप है कि उन्होंने बार-बार प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। चाहे इन दावों की सत्यता का अंतिम निर्णय जांच और तथ्यों के आधार पर हो लेकिन यह प्रश्न अवश्य महत्वपूर्ण है कि यदि किसी नागरिक को अपनी समस्या के समाधान के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, तो उसके मन में व्यवस्था के प्रति कैसी भावना पैदा होगी? मानव स्वभाव का एक सामान्य सिद्धांत है कि उपेक्षा सबसे गहरा घाव देती है। विरोध का जवाब यदि विरोध से मिले तो व्यक्ति संघर्ष करता है। लेकिन यदि उसे लगातार अनसुना किया जाए तो वह भीतर से टूटने लगता है। बार-बार की उपेक्षा निराशा को जन्म देती है और निराशा धीरे-धीरे आक्रोश में बदल जाती है। विज्ञान हमें बताता है कि दबाव और ऊर्जा का संचय अनंत काल तक नहीं हो सकता। धरती के भीतर जमा ऊर्जा जब अपनी सीमा पार कर जाती है तो भूकंप आता है, ज्वालामुखी फूटता है और भूगर्भीय परिवर्तन दिखाई देते हैं। समाज भी इससे अलग नहीं है। सामाजिक और प्रशासनिक दबाव जब लगातार बढ़ते रहते हैं और समाधान का रास्ता बंद हो जाता है, तब असंतोष विस्फोटक रूप ले सकता है।यही कारण है कि किसी भी लोकतंत्र में शिकायत निवारण प्रणाली को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र नागरिक की सुनवाई का भी नाम है। लोकतंत्र का अर्थ है कि अंतिम व्यक्ति की आवाज भी शासन तक पहुंचे और उसका सम्मान हो। भरत तिवारी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या उनकी शिकायतों और मांगों को समय रहते सुना गया था? क्या संवाद के सभी रास्ते खुले हुए थे? क्या प्रशासन ने उनके साथ गंभीर संवाद स्थापित करने का प्रयास किया? क्या जनप्रतिनिधियों ने समस्या के समाधान की दिशा में पहल की? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल किसी एक विभाग या संस्था को नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र को देना होगा। यहां एक महत्वपूर्ण बात और स्पष्ट कर देना आवश्यक है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून सर्वोपरि होता है। हिंसा और हथियार कभी भी स्थायी समाधान नहीं हो सकते। लोकतंत्र में संघर्ष का मार्ग संवैधानिक होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी व्यक्ति के व्यवहार को समझने से पहले उसकी परिस्थितियों को भी समझा जाए। यदि कोई व्यक्ति व्यवस्था के प्रति अत्यधिक आक्रोश व्यक्त कर रहा है तो उसके पीछे मौजूद कारणों की जांच भी आवश्यक है। अक्सर देखा गया है कि किसी घटना के बाद व्यक्ति केंद्र में आ जाता है और समस्या पीछे छूट जाती है। लेकिन एक परिपक्व समाज का दायित्व है कि वह व्यक्ति के साथ-साथ उस समस्या को भी समझे जिसने पूरे घटनाक्रम को जन्म दिया। यदि किसी क्षेत्र में बाढ़, विस्थापन, पुनर्वास, भ्रष्टाचार, विकास योजनाओं की विफलता या प्रशासनिक उदासीनता जैसे प्रश्न मौजूद हैं, तो उन पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए। आज पूरे देश में एक व्यापक चिंता यह भी है कि नागरिक और शासन के बीच संवाद का अंतराल लगातार बढ़ रहा है। पहले जनप्रतिनिधि गांवों में अधिक दिखाई देते थे। अधिकारी सीधे जनता से संवाद करते थे। अब अधिकांश संवाद कागजों, पोर्टलों और औपचारिक बैठकों तक सीमित होता जा रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि आम नागरिक स्वयं को व्यवस्था से दूर महसूस करने लगा है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह असहमति को स्थान देता है। प्रश्न पूछना लोकतंत्र की आत्मा है। यदि नागरिक प्रश्न नहीं पूछेगा तो जवाबदेही कैसे तय होगी? लेकिन वर्तमान समय में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि प्रश्न पूछने वालों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग हर सरकारी कार्रवाई को गलत मानने लगते हैं। दोनों ही स्थितियां लोकतांत्रिक संतुलन के लिए उचित नहीं हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार आलोचना सुनती है और नागरिक कानून का सम्मान करता है। यही संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाता है। लेकिन जब संवाद समाप्त हो जाता है, तब टकराव शुरू होता है। भरत तिवारी की मृत्यु के बाद उठ रहे प्रश्नों को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आवश्यक है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष , पारदर्शी और विश्वसनीय जांच हो। जनता को सत्य जानने का अधिकार है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। लेकिन जांच से भी बड़ा प्रश्न है व्यवस्था का आत्ममंथन। यदि वास्तव में किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा, यदि उसकी शिकायतों को समय रहते नहीं सुना गया, यदि प्रशासनिक संवेदनशीलता का अभाव रहा, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की विफलता मानी जाएगी। आज आवश्यकता भरत तिवारी को लेकर भावनात्मक ध्रुवीकरण की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उनकी कहानी से सबक लिया जाए। यदि समाज केवल व्यक्ति पर बहस करता रहेगा और उन कारणों को नजरअंदाज कर देगा जिन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को जन्म दिया, तो भविष्य में भी ऐसे विवाद सामने आते रहेंगे। सरकारों को यह समझना होगा कि विकास केवल सड़कों, पुलों और भवनों से नहीं मापा जाता। विकास का सबसे बड़ा पैमाना नागरिक का विश्वास होता है। जिस दिन जनता को यह भरोसा हो जाएगा कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी, उसकी समस्या का समाधान होगा और उसे न्याय मिलेगा, उस दिन लोकतंत्र वास्तव में मजबूत होगा। भरत तिवारी का प्रकरण इसी विश्वास की परीक्षा है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का आईना है जिसमें जनता और शासन के बीच संवाद कमजोर पड़ता दिखाई देता है। उनकी मृत्यु ने चाहे जितने विवाद खड़े किए हों, लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य छोड़ा है—क्या आज भी इस देश का सामान्य नागरिक यह विश्वास कर सकता है कि उसकी आवाज सत्ता तक पहुंचेगी और उसे सुना जाएगा? यदि इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक नहीं है, तो समस्या किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसे जनता की सेवा के लिए बनाया गया था। और यदि लोकतंत्र को सचमुच मजबूत बनाना है, तो भरत तिवारी जैसे प्रसंगों को केवल समाचार बनाकर भूल जाना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें चेतावनी की तरह पढ़ना होगा, आत्ममंथन की तरह समझना होगा और सुधार के अवसर की तरह स्वीकार करना होगा। क्योंकि इतिहास गवाह है कि जनता की आवाज को लंबे समय तक दबाया जा सकता है, अनसुना किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति अंततः उसी आवाज में निहित होती है।भरत तिवारी आज जीवित हों या न हों लेकिन उनसे जुड़े प्रश्न अभी भी जीवित हैं और जब तक उन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह बहस भी जीवित रहेगी। The post भरत तिवारी: एक मौत, अनेक सवाल और लोकतंत्र के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
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- भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथियों के अनुसार मनाए जाने वाले उत्सव नहीं, बल्कि जीवन और प्रकृति के संतुलन को समझाने वाले अध्याय हैं। ऐसा ही एक दिव्य पर्व है – गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है। यह दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, जब सम्पूर्ण व्रज भूमि में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाई देता है। परंतु इस पर्व का रहस्य केवल पूजा या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव-जीवन के अहंकार, विनम्रता, प्रकृति और भगवान के साथ सामंजस्य का गूढ़ संदेश देता है। अहंकार के गर्व को तोड़ने वाली लीला प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब इंद्र के मन में अपनी देवत्व-शक्ति का अहंकार अत्यधिक बढ़ गया, तो उन्होंने वर्षा के नियंत्रण को अपनी व्यक्तिगत सत्ता समझ लिया। वे भूल गए कि वर्षा भी उसी परम ब्रह्म की व्यवस्था का एक अंश है। उसी समय बालरूप श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को समझाया कि “हम सबका पोषण इंद्र नहीं, प्रकृति करती है – यह गोवर्धन पर्वत, यह गायें, यह वन-भूमि।” इंद्र-यज्ञ को रोककर उन्होंने व्रजवासियों से कहा कि वे इस पर्वत का पूजन करें, क्योंकि यह हमारी अन्नदात्री धरती का प्रतीक है। जब इंद्र को यह बात अहंकारजन्य लगी, तो उन्होंने प्रलयकारी वर्षा से गोकुल को डुबाने का प्रयास किया। परंतु वही बालक श्रीकृष्ण सात दिनों तक अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे, और समस्त व्रज की रक्षा की। यह केवल चमत्कार नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक शिक्षा थी – जिसके भीतर श्रद्धा और करुणा का बल हो, उसके लिए प्रकृति भी सहायक बन जाती है। गोवर्धन की दिव्यता और प्रतीकात्मकता गोवर्धन केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि जीवित चेतना का प्रतीक माना गया है। यह पर्वत धरती, जल, वायु और जीवन के संरक्षण का साक्षात् प्रतीक है। पुराणों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को गोवर्धन के रूप में प्रकट कर यह दर्शाया कि ईश्वर प्रकृति में ही बसते हैं। गोवर्धन पूजा का अर्थ केवल पहाड़ की आराधना नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण से ही संभव है। जब हम गोवर्धन की पूजा करते हैं, तो वस्तुतः हम अपने अन्न, जल, पशु, वनस्पति और पर्यावरण का सम्मान करते हैं। अन्नकूट का दार्शनिक अर्थ गोवर्धन पूजा के दिन व्रजवासी तरह-तरह के अन्न और पकवान बनाकर उन्हें पर्वत के प्रतीक रूप में सजाते हैं, इसे अन्नकूट कहा जाता है। यह केवल भोग नहीं, बल्कि “अन्न ही ब्रह्म है” की वेदवाणी का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है। इस दिन मनुष्य अपने श्रम और प्रकृति की देन के प्रति आभार प्रकट करता है। अन्नकूट यह सिखाता है कि समृद्धि तब तक अर्थहीन है जब तक उसमें बाँटने की भावना न हो। श्रीकृष्ण ने जब सबके साथ बैठकर अन्न का सेवन किया, तो यह सामाजिक समरसता और समानता का अद्भुत उदाहरण बना। विनम्रता का पाठ इंद्र का अहंकार तब शांत हुआ जब उन्होंने देखा कि जिस ‘बालक’ को वे साधारण मानव समझते थे, वही परमात्मा स्वयं हैं। वे पश्चाताप से भर उठे और श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। इस क्षण में देवता से भी बड़ा दर्शन छिपा है – जिस क्षण अहंकार मिटता है, वहीं सच्चा देवत्व प्रकट होता है। आज जब मानव अपने विज्ञान, सत्ता और संपत्ति के बल पर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा है, तब गोवर्धन लीला यह याद दिलाती है कि अहंकार चाहे देवों में भी क्यों न हो, उसका पतन निश्चित है। गोवर्धन और आधुनिक संदर्भ यदि हम इस पर्व को आधुनिक दृष्टि से देखें, तो यह पर्यावरण चेतना का सबसे प्राचीन संदेश देता है। गोवर्धन पूजा बताती है कि मानव को केवल उपभोग नहीं, बल्कि संरक्षण का भाव रखना चाहिए। आज जब धरती जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अंधाधुंध उपभोग से कराह रही है, तब श्रीकृष्ण की यह लीला हमें पुनः सिखाती है कि — “धरती की पूजा करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है।” गोवर्धन पूजा में गायों की सेवा, अन्न का दान, वृक्षों का पूजन और पशुधन की रक्षा, ये सब प्रतीक हैं संतुलित जीवन के। गोप और गोकुल की आत्मा गोवर्धन पूजा केवल धर्म का पालन नहीं, बल्कि प्रेम और समुदाय की अभिव्यक्ति भी है। जिस प्रकार सभी व्रजवासी बच्चे, वृद्ध, नारी, पुरुष एक साथ खड़े होकर संकट का सामना करते हैं, वही समाज की एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। आज जब समाज में विभाजन और स्वार्थ की दीवारें ऊँची हो रही हैं, तब गोवर्धन पर्व यह संदेश देता है कि “एकता और सहयोग से ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।” गिरिराज की पावन स्मृति व्रजभूमि में आज भी गोवर्धन पर्वत के परिक्रमा-पथ पर लाखों श्रद्धालु जाते हैं। कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण का चरण पड़ा, वहाँ की मिट्टी भी तिलक बन जाती है। गिरिराज के चरणों में झुकना, वास्तव में स्वयं के अहंकार को मिटाना है। गोवर्धन का प्रत्येक कंकड़ हमें यह सिखाता है कि जो झुकता है, वही ऊँचा उठता है। गोवर्धन का शाश्वत संदेश गोवर्धन पूजा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि आत्मबोध का उत्सव है। यह हमें सिखाता है – · अहंकार का अंत ही दिव्यता की शुरुआत है। · प्रकृति का सम्मान ही सच्ची पूजा है। · समरसता और सहयोग ही जीवन का आधार हैं। जब-जब मानव अपने सीमित अस्तित्व को ईश्वर से बड़ा समझने लगेगा, तब-तब कोई न कोई श्रीकृष्ण उसे उसकी मर्यादा का स्मरण कराएगा। गोवर्धन पर्व इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर की विनम्रता और प्रेम में निवास करते हैं। और शायद यही कारण है कि यह पर्व दीपोत्सव के अगले दिन आता है, क्योंकि अहंकार के अंधकार के बाद ही भक्ति का प्रकाश फैलता है। उमेश कुमार साहू The post धरती के माथे का तिलक गोवर्धन, जहाँ ईश्वर ने विनम्रता सिखाई appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
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- लेकिन यदि हम भारतीय विमानन उद्योग के वित्तीय इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। एयर डेक्कन और सहारा एयरलाइंस इतिहास बन गईं। The post क्यों लगातार असफल हो रही हैं भारतीय एयरलाइंस ? appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- हम सभी यह जानते हैं कि सोशल मीडिया इंटरनेट आधारित ऐसे डिजिटल मंच हैं, जहां लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं, विभिन्न जानकारियां, विचार आदि साझा करते हैं, अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं The post विश्व सोशल मीडिया दिवस: संवाद, सूचना और नवाचार का मंच। appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
- वेनेजुएला की त्रासदी ने एक सकारात्मक पक्ष भी सामने रखा। आधुनिक तकनीक ने कुछ क्षेत्रों में लोगों को भूकम्प के झटके महसूस होने से कुछ सेकंड पहले चेतावनी दी। The post क्या हम विकास और विनाश के बीच संतुलन साध पाएंगे? appeared first on प्रवक्ता.कॉम – Pravakta.Com.
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